आज हिंदी साहित्य के सुप्रसिद्ध कवि, राष्ट्रकवि दिनकर जी की जयंती है। उनके चरणों में मेरा शत शत नमन। चाहे वो ओज से भरी रश्मिरथी हो या प्रेम की पराकाष्ठा दर्शाती उर्वशी, चाहे वो किसानों की पीड़ा दर्शाती कृषक कविता हो या परशुराम_की_प्रतीक्षा में छुपा दर्द, ये अमर कविताएं हरेक कालखंड में उतने प्रासंगिक और प्रेरणादायक हैं, जितने तब थे जब लिखे गए थे।
दोस्तों, आजकल जिंदगी में आने वाले संघर्षों के आगे हार मानकर आए दिन हमारे युवाओं की आत्महत्या की खबरें सुनने/ पढ़ने को मिलती हैं। तब दिनकर साहब की कविताएं याद आती हैं। राष्ट्रकवि दिनकर जी की ऐसी ही प्रेरणादायी इस काव्यांश को देखिए:
सच है, विपत्ति जब आती है,
कायर को ही दहलाती है,
शूरमा नहीं विचलित होते,
क्षण एक नहीं धीरज खोते,
विघ्नों को गले लगाते हैं,
काँटों में राह बनाते हैं।
है कौन विघ्न ऐसा जग में,
टिक सके वीर नर के मग में
खम ठोंक ठेलता है जब नर,
पर्वत के जाते पाँव उखड़,
मानव जब जोर लगाता है,
पत्थर पानी बन जाता है।
पीसा जाता जब इक्षु-दण्ड,
झरती रस की धारा अखण्ड,
मेंहदी जब सहती है प्रहार,
बनती ललनाओं का सिंगार,
जब फूल पिरोये जाते हैं,
हम उनको गले लगाते हैं।
वसुधा का नेता कौन हुआ?
भूखण्ड-विजेता कौन हुआ ?
अतुलित यश क्रेता कौन हुआ?
नव-धर्म प्रणेता कौन हुआ ?
जिसने न कभी आराम किया,
विघ्नों में रहकर नाम किया”।
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दोस्तों, मेरा मानना है कि असल मायने में दिनकर जी की जयंती मनाने की सार्थकता तभी होगी जब हम उनकी रचनाओं से प्रेरणा लें और वो सीख अपनी जिंदगी में उतारें।
आप सबको दिनकर जयंती की ढेर सारी शुभकामनाएं