दोस्तों, आज मां भारती के दो महान स्वतंत्रता सेनानियों, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी और पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी का जन्मदिन है। एक ने देश-दुनिया को “अहिंसा वादी दर्शन” से परिचित कराया तो दूसरे “ईमानदारी, सरलता और सौम्यता” के मिसाल बने। इन दोनों महापुरुषों की जयंती पर उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि और सादर नमन।![]()
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दोस्तों, कहते हैं कि अन्याय सहने वाला अन्याय करने के बराबर पाप का भागीदार होता है, और हम ये भी जानते है कि अगर कोई हमें कमजोर समझकर हमपर वार करे तो हमें चुप नहीं रहना चाहिए। पर दोस्तों, अन्याय के विरोध करने का एक दूसरा तरीका भी है, जिसे हम “गाँधीवादी विचारधारा” कहते हैं। यह विचारधारा “जो तोकू कांटा बुवे, ताहि बोई तू फूल”, पर आधारित है।
क्या आज के दौर में भी यह विचार प्रासंगिक है? एक उदाहरण से देखते हैं। आजकल युवाओ का खून इतना गरम है कि बहुत छोटी छोटी बातों पर घमासान छिड़ जाता है। ज्यादातर केसेस में हम गुस्से में सामने वाले व्यक्ति को, जोकि पारिवारिक सदस्य या अपना बच्चा भी हो सकता है, अपशब्द बोलते हैं ताकि उसे समझ आ जाए कि हम उससे कितने खफा हैं और हम चाहते है कि वो भी react करे, या तो अपशब्द बोलकर या गुस्सा करके या गलती स्वीकार कर क्षमा मांगकर। इसके विपरित, अगर हम किसी पर अपना गुस्सा निकाल रहे हों और सामने वाला चुपचाप खड़ा होकर मुस्कराता रहे, तो हम क्या करेंगे? सोचिएगा?
दोस्तों, कहने का मतलब यह है कि हमारे पास समय और ऊर्जा, दोनों ही सीमित मात्रा में है, जिसे या तो हम विध्वंसकारी (Distructive ) गतिविधियों में लगाये या उसे रचनात्मक (Constructive) गतिविधियों में, यह हमारे ऊपर है। किसी इंसान के अन्दर की पाशविक भावनाओं को जगाना तो आसान है, पर किसी इन्सान के अन्दर की मानवीय भावनाओं को हम उजागर कर पाएं, तो हम बुद्ध और वह अंगुलिमाल से संत बन जाए। सोचिएगा। प्रणाम।