M priyadarshini

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स्वामी_रामकृष्ण_परमहंस

कस्तूरी मृग में बसे:

नमस्कार दोस्तो। आज हमारे आदर्श स्वामी विवेकानंद जी के गुरु स्वामी_रामकृष्ण_परमहंस जी की जयंती है। बचपन से ही कई बार मुझे दक्षिणेश्वर मंदिर, कोलकाता जाने का मौका मिला और उसी क्रम में मुझे स्वामी परमहंसजी के मां काली के प्रति भक्तिभाव और उनके उनके प्रति निश्चल भक्ति से रूबरू होने का मौका मिला। सच में उनमें कितनी अलौकिक शक्ति थी कि उन्होंने बस एक ही क्षण में ही बालक नरेन को किसी कीर्तन में देख कर उनके गुण को पहचान लिया और उसी बालक ने स्वामी_विवेकानंद बनकर देश और समाज के कल्याण के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया।

दोस्तों, कई बार मैं सोचती हूं कि किसी की छुपी हुई प्रतिभा को उजागर करने में जौहरी का भी एक बड़ा योगदान होता है। एक सच ये भी है कि हर इंसान में कुछ न कुछ गुण जरूर होता है, बस देखने वाले की नजर चाहिए। इसीलिए मुझे लगता है कि हम हर इंसान से unbiased होकर मिलें और हर किसी से कुछ सीखने की कोशिश करे। अगर किसी अच्छे इंसान से हमारी मुलाकात होती है तो उसकी अच्छाई को अपने में आत्मसात करने की कोशिश करें और अगर बदकिस्मती से हमें ऐसे लोग मिलें जिनसे हमारी आत्मा को कोई साकारात्मक प्रेरणा नही मिल रही है, तो हम उनसे घृणा करने या उनसे बात ना करने के बजाय उनसे ये सीखे कि उनके आत्मिक बल पर उनकी मानसिक_दुर्बलताए हावी हो गयी है तभी उनकी संवेदनाएं धूमिल हो गईं हैं। ऐसे लोगों से हम यह प्रेरणा ले सकते हैं कि हम अपने आत्मिक बल पर अपने पाशविक_प्रवृति को हावी ना होने दें।

दोस्तों, कमल को हम सबने देखा है। कितने कीचड़ में रहता है, हर रोज उस कमल की कीचड़ में पनपने वाले गंदे कीड़ो के साथ मुलाकात होती है पर क्या वो अपना गुण बदल देता है!! नहीं ना दोस्तों। फिर हम क्यों छोटी छोटी बातो में अपना मानसिक संतुलन खोकर कुछ ऐसा कर जाते हैं जिसके लिए बाद में ताउम्र पछताना पड़ता है। क्या ये ठीक है? जरा सोचिएगा।