M priyadarshini

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नमस्ते दोस्तों। आज मुझे जल पर आधारित अपनी पुस्तक जल_माँ को माननीय श्री गजेन्द्र_सिंह शेखावत, केन्द्रीय जल_शक्ति_मंत्री, भारत सरकार के समक्ष शुभकामना संदेश प्राप्त करने हेतु प्रस्तुत करने का मौका मिला। माननीय मंत्री जी ने जल मां पुस्तक के चर्चा के क्रम में बताया कि जल शक्ति मंत्रालय जल संरक्षण, जल के पुनर्भरण और पुन: उपयोग, वर्षा जल संचयन आदि के लिए अत्यंत संवेदशील है | दोस्तों इस पुस्तक का आधिकारिक तौर इसका विमोचन बहुत जल्द ही किया जाएगा। इस मीटिंग को ऑर्गेनाइज करने का श्रेय श्री आशुतोष चौहान जी को जाता है जो IIA के कोऑर्डिनेटर, इंटरनेशनल अफेयर्स हैं। इस मीटिंग में हमारे साथ थे IIA, दिल्ली के चेयरमैन डा एल के पांडेय जी , चैप्टर कन्वेनर श्री नीरज बजाज जी, श्री नरेंद्र कोठारी जी और श्री रवि कुमार।

आइये हम संक्षेप में जल माँ पर बात करते हैं। “संयुक्त राष्ट्र एजेंडा 2030” अनुसार बेहतर जल संसाधन प्रबंधन और सतत विकास लक्ष्यों (SDG) को प्राप्त करने के लिए, हमें जल की कीमत को समझना एवं उसे सहेजने का प्रयास करना होगा। उनके अनुसार किसी भी चीज की कीमत को निर्धारित करने के तीन दृष्टिकोण हैं; पहला, उसके विनिमय मूल्य के आधार पर, दूसरा उसकी उपयोगिता के आधार पर और तीसरा, उसके भावनात्मक मूल्य के आधार पर। हमें जल के इन सभी मूल्यों को ध्यान में रखकर उसे सहेजने के लिए कार्य करने की जरूरत है तभी हम “जल” के प्रति जागरूक हो सकते हैं। हमने इस किताब में जल के इसी भावनात्मक मूल्य को केंद्र में रखा है।

दोस्तों, एक जल शोधकर्ता, जैव-वैज्ञानिक और पर्यावरणविद् होने के नाते, मैंने यह महसूस किया है कि हमारे पूर्वजों ने जल को जिस प्राकृतिक तरीके से, हमारी धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का हिस्सा बनाकर, जल को स-सम्मान सहेजा है, हमें उनके अनुभवों से सीख कर उसे अपने रोजमर्रा की जिंदगी में उतारने की नितांत आवश्यकता है। तभी हम जल को बचा सकते है। इस किताब की सूत्रधार एक काल्पनिक चरित्र, -“जल-मां” हैं, जो पाठकों और जल के बीच का सम्बन्ध सूत्र हैं। दोस्तों, मेरा आप सभी सुधी जनों से अनुरोध है कि आप भी अपने अन्दर की उस “जल माँ” को जागृत करें और जल को उचित सम्मान दें।