M priyadarshini

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महिला_सम्मान

नमस्ते दोस्तों। कल, दिनांक 04-10- 23 को जंतर_मंतर, दिल्ली, पर “अखिल भारतीय आंगनबाड़ी कर्मचारी कृति समिति” के आह्वान पर विभिन्न राज्यों के “आंगनबाड़ी कर्मचारी संघ” ने सरकार के समक्ष शांतिपूर्ण धरना दिया था, जिसमें बिहार और पूरे भारत से भारी संख्या में आई महिलाओं से मिलने और इनके संघर्षों एवं लंबे सरकारी उपेक्षा को समझने का मौका मिला।

दोस्तों, आपमें से अधिकांशतः लोगों ने आंगनवाड़ी के बारे में जरूर सुना होगा। तपती और झुलसती गर्मी, घनघोर बारिश या कड़कड़ाती सर्दी में भी, इन आंगनबाड़ी महिलाओं को अपने घर की जिम्मेदारियां पूरा करके अपने आस-पास से गुजरते हुए जरूर देखा होगा। भारत के हर छोटे-बड़े गांव-कस्बों में, जहां सरकारी या गैरसरकारी सुविधा पहुंचना मुश्किल है, वहां इन्हें गर्भवती महिलाओं को प्रसव पूर्व देखभाल, स्वच्छता और अच्छे खान पान का महत्व समझाते, नवजात शिशुओं के देखभाल और परवरिश के तरीके बताते और छोटे बच्चों को पोलियो का डोज पिलाने से लेकर उन्हें अनौपचारिक रूप से पढ़ना-लिखना सिखाते हुए भी आपने जरूर देखा होगा। #कोरोना जैसी महामारी के वक़्त भी इन्होंने जिस मुस्तैदी, मानवतावादी जज्बे और जोश से अपना फर्ज निभाया, उससे भी आप सब जरुर वाकिफ होंगे।

दोस्तों, पर आपमें से कितने लोग इनके दर्द, हताशा, दुविधा और उपेक्षा के भाव से वाकिफ हैं, पता नहीं? इस घोर मंहगाई के काल में इनके कार्यों का क्या मेहनताना मिलता है, ये किसी से छुपा नहीं है। आज के दौर में जहां हम #महिला_सशक्तिकरण, #न्यूनतम_मजदूरी, #आत्मनिर्भरता, #महिला_सम्मान और अन्य महिला कल्याणकारी योजनाओं आदि की बातें करते हैं, वहीं सुदूर भारत की महिलाओं और बच्चों की देखभाल करने वाली ये जीवट आंगनबाड़ी वर्कर्स को प्रति माह महज 4500-5000 रूपये पा रही हैं!! ये हैरत की बात नहीं लगती? इतने कम पैसे में इनके घर-परिवार का खर्च कैसे चलता होगा? दूसरों को कुपोषण से बचाने के जुगत में लगीं ये बेचारी खुद गरीबी में कैसे खुद कुपोषण का शिकार हो रही हैं, ये अत्यंत शोचनीय विषय है!! शरीर के अशक्य हो जाने के बाद ना तो इन्हें रिटायरमेंट के बाद कोई gratuity मिलती है, ना ही कोई सरकारी कर्मचारी का दर्जा और ना ही किसी अनहोनी पर परिवार को भुगतान।

दोस्तों, इन्ही मुद्दों को लेकर कल जंतर मंतर पर शांतिपूर्ण धरना दे रहीं इन आंगनबाड़ी महिलाओं की मुख्य मांगें थीं कि अगर हम सरकार का काम कर रहे हैं तो हमें भी वो सरकारी कर्मचारी घोषित करें, सर्वोच्च न्यायलय के आदेशानुसार उनकी GRATUITY लागू हो और आंगनवाडी केन्द्रों को नर्सरी स्कूल का दर्जा मिले। इस धरने में इन लोगों से मिलकर, हाशिए पर रखे जाने के इनके कष्ट और निराशा को महसूस कर, सेवा के एवज में सम्मान का हक़ पाने की शांतिपूर्ण कोशिश और जज्बा देखकर सच में मैं भावविह्वल हो गयी। मैं इनकी तरफ से भारत के नीति_निर्धारकों से अनुरोध करती हूँ कि वो इसपर शीघ्र संज्ञान लें और इनकी मांगो की पूर्ति करें जिससे खुद के कार्य के प्रति इनके मन सम्मान जागृत हो।

इस बैठक में पातेपुर (वैशाली) निवासी श्रीमती गीताजी (प्रदेश अध्यक्ष, बिहार आंगनबाड़ी कर्मचारी संघ), श्रीमती मंजू कुमारी ( पटना जिलाध्यक्ष, बिक्रम पटना), श्रीमती किरण जी (सीतामढ़ी, बिहार कोषाध्यक्ष), श्रीमती रेनू जी (बिक्रम, पटना), श्रीमती माधुरी जी ( बिक्रम, पटना), श्रीमती सुजाता जी ( मसौढ़ी, पटना) और अन्य कई नारी शक्ति से मुझे मिलने का मौका मिला।

इनके नारों की दो पंक्तियाँ मैं यहाँ उद्धृत करना चाहूंगी,

जहाँ न हो कोई खेत क्यारी,

वहां भी होंगी आंगनवाड़ी

आप सबके जज्बे को सलाम करती हूँ।