कल बिहार के एक रिटायर्ड सीनियर अफसर से मेरी बात हो रही थी। उन्होंने कहा कि अब मेरी सारी जरूरतें खत्म हो गईं है, तो मुझे अपनी जिंदगी का कोई purpose ही नहीं समझ आ रहा। वो अकेलेपन के कारण अवसाद (depression) से जूझ रहे हैं, जिसके कारण उन्हें दवाइयों का सहारा लेना पड़ रहा है। उनकी इस बात पर मुझे मेरे मैनेजमेंट स्टडीज के दौरान के मेरे सबसे favourite Maslow साहब याद आ गए, जिनकी थ्योरी मैं शेयर कर रही हूं।
कई बार हमारे जेहन में ये सवाल आता है कि हमारी जरूरतें क्या हैं, हम इसे कैसे catergorise करते हैं और जिसे पूरा करके हम खुश कैसे रह सकते है? इस बारे में Maslow साहब की hierarchy_of_needs की थ्योरी है। इस थ्योरी में वो कहते हैं कि हमारी पहली जरुरत होती है अपने लिए “रोटी, कपडा और मकान” की जरुरत को पूरा करना। अगर हमारी ये जरूरत पूरी हो गयी तो हम psychological जरूरतों को पूरा करने का प्रयास करते हैं। भौतिकवादी संस्कृति की तमाम सुख-सुविधाओं को पाने और उसका उपभोग करने की ललक हमें आकर्षित करती है। अगर एक अच्छा lifestyle हमें मिल गया तो अब हम समाज में social_needs, मतलब अच्छा नाम और शोहरत प्राप्त करने की तरफ झुकते हैं, जिससे समाज में हमारी अपनी अलग पहचान बने। आज के समाज में ९९% लोग इन्हें जरूरतों को पूरा करते-करते अपनी सारी जिंदगी गुजार देते हैं। पर इनमें से चंद लोग ऐसे भी होते हैं जो इन जरुरतो के बाद एक और जरुरत को पूरा करना चाहते हैं, जहां उन्हें दूसरों को खुशी देकर खुशी महसूस होती है। इसे हम Self_actualisation कहते हैं, जहाँ हम पैसे या शोहरत के लिए नहीं, बस निस्वार्थ भाव से समाज के उत्थान के लिए काम करते हैं और वैसा करके हमें आंतरिक ख़ुशी मिलती है।
दोस्तों, मुझे लगता है कि एक सामाजिक प्राणी होने के नाते हम सबको एक स्वस्थ समाज के उत्थान में अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। नहीं तो हम ऊपर लिखे उदाहरण की तरह इस Maslow के पिरामिड के नीचे के दो या तीन पायदान में ही हम अपनी जिंदगी गुजार कर बाद में account में पैसे और आतम रीता की स्थिति में पछताते रहेंगे।