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M priyadarshini

संस्कृति मानव समाज की बुनियाद है; जीवन विधि है

संस्कृति मानव समाज की बुनियाद है; जीवन विधि है; और मनुष्य का सबसे मूल्यवान निधि है। संस्कृति किसी समाज में गहराई तक व्याप्त गुणों के समग्र स्वरूप का नाम है, जो उस समाज के सोचने, विचारने, कार्य करने के स्वरूप में अन्तर्निहित होती है। संस्कृति व्यक्ति की मूल्यों, मान्यताओं, पहचान और विरासत का मूल है। यह उनकी भाषा, परंपरा, कला, संगीत, चेतना, दृष्टिकोण और जीवनशैली आदि को आकार देती है। संस्कृति व्यक्तियों को अपनेपन, गौरव और उद्देश्य की भावना प्रदान करती है। यह सामाजिक समावेशिता को बढ़ावा देती है, विविधता को प्रोत्साहित करती है और पिछली पीढ़ियों के ज्ञान को संरक्षित और संवर्धित करती है। संस्कृति के माध्यम से लोग अपनी जड़ों से जुड़ते हैं, अपने इतिहास को समझते हैं और अपनी परंपराओं को भावी पीढ़ियों तक पहुँचाते हैं। यह एक अमूल्य निधि है जो जीवन को समृद्ध बनाती है, एकता को प्रोत्साहित करती है और प्रत्येक व्यक्ति और समाज की विशिष्टता को परिभाषित करती है।

संस्कृति यानी उत्तम या सुधरी हुई स्थिति। मनुष्य स्वभाव से एक प्रगतिशील प्राणी है और बौद्धिक क्षमता का उपयोग कर अपने चारों ओर की परिस्थितियों को निरन्तर सुधारता और उन्नत करता रहता है, मसलन वो प्रत्येक जीवन-पद्धति, रीति-रिवाज, रहन-सहन, आचार-विचार, नवीन अनुसन्धान और आविष्कार, जिससे मनुष्य अपने आंतरिक और बाह्य वातावरण को ऊँचा उठाता है तथा सभ्य बनता है। सभ्यता संस्कृति का अंग है। सभ्यता (Civilization) से मनुष्य के भौतिक क्षेत्र की प्रगति सूचित होती है जबकि संस्कृति (Culture) से मानसिक क्षेत्र की प्रगति सूचित होती है। अपनी संस्कृति और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित और संवर्धित करना हमारा अहम कर्तव्यों में से एक है। सोचिएगा…!!