M priyadarshini

Worlds BOW

झुकती_है_दुनिया_झुकाने_वाला_चाहिए, इन पंक्तियों को आपमें से कई लोगो ने सकारात्मक रूप में जरूर सुना होगा, लेकिन ऐसे दुनिया झुकेगी कि पूरे धरती वासियों के अस्तित्व के लिए खतरे की घंटी बजने लगेगी, और उसको झुकाने वाले मनुष्य ही होंगे, ये शायद किसी ने कभी नही सोचा होगा। जी हां दोस्तो, एक वैज्ञानिक स्टडी में ये बात सामने आई है कि भूमिगत जल के अंधाधुंध दोहन ने पानी के इतने बड़े द्रव्यमान को स्थानांतरित कर दिया है कि अपनी पृथ्वी, वर्ष 1993 और 2010 के बीच लगभग 80 सेंटीमीटर पूरब की ओर झुक गयी है। वैज्ञानिकों ने पहले अनुमान लगाया था कि मनुष्य ने 2,150 गीगाटन भूजल का दोहन किया, जो 1993 से 2010 तक समुद्र के जलस्तर में छह मिलीमीटर से अधिक की वृद्धि के बराबर है। भूगर्भ वैज्ञानिकों का कहना है, कि इसके कई दूरगामी परिणाम हो सकते हैं ।जलवायु परिवर्तन, बेमौसम की बरसात और सूखे के कुछ उदाहरण तो आप हम देख ही रहे हैं। शायद हमारे पूर्वजों को कलयुग में हमारी पृथ्वी पर किए जा रहे इस अत्याचार का भान होगा तभी उन्होंने यजुर्वेद में

ईशोपनिषद के नीचे लिखे गए इस श्लोक की रचना की होगी.

ॐ_ईशावास्यमिदं_सर्वं_यत्किञ्च_जगत्यां_जगत्

तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम् ॥ १॥

जिसका भावार्थ है,जड़-चेतन प्राणियों वाली यह समस्त सृष्टि में ईश्वर का ही अंश है। हम सब इसके पदार्थों का आवश्यकतानुसार भोग करे, परंतु ‘यह सब मेरा नहीं है के भाव के साथ’ उनका संग्रह न करे, जिससे ये सृष्टि अनंतकाल तक चलती रहे।

जबकि हम मनुष्यों को लगने लगा है कि मेरे जमीन का हिस्सा हमारे पास जन्म जन्म तक रहेगा और उसके अधिकार क्षेत्र के प्रकृति के समस्त घटक हमारे ही हैं इसीलिए उसे हम कैसे भी उपयोग करें वो हमारी मर्जी है। और जब सनातन संस्कृति के अनुसार पृथ्वी के अंदर बैठे शेषनाग ने एक करवट ली, और वैज्ञानिकों के अनुसार पृथ्वी के प्लेट_टेक्टोनिक्स में थोड़ा भी बदलाव हुआ, तो अपने पैर के नीचे की जमीन भी सरकने लग जाती है। दोस्तो, हम भगवान की पूजा करते हैं ना। भगवान शब्द का मतलब होता है, ऐश्वर्यपूर्ण और पूज्य, पर अगर भगवान के शाब्दिक मतलब पर जाएं तो भ से भूमि , ग (गगन), व (वायु), अ (अग्नि) न(नीर) होता है। अतः प्रकृति के इन पांच तत्वों को संतुलित रखना भी एक पूजा है ।

दोस्तों, अब भी देर नहीं हुई है, आईये हम सब मिलकर प्रकृति के इन घटकों के असंतुलन को रोकेें और इस सृष्टि को आने वाली पीढ़ियों के लिए बचाने के लिए संकल्पित हो। तभी हमारे जीवन की सार्थकता है।